एक डाक्टर का प्रेम पत्र.
पिछले हफ़्ते मेरठ जाना हुआ . वहा कुछ लोगो से भी मिले. जिनमे हमारे ब्लोगर्स दोस्त भी शामिल थे.वही हमे न्योता मिला एक डाक्टर दोस्त का. कहा हो भाइ इतने दिनो से कहा हो बिना मिले मत जाना. पहुचे जी मिलने ,लपक के मिले दोस्त , अच्छी आवभगत की. इस बीच दोस्त अपनी एक मोटी सी बडी पुरानी डायरी खोल कर हमे कुछ बताने लगे . सच मे दिल भर आया कि अगर ये डायरी हाथ लग जाये तो कितने दिनो तक हम अपने ब्लोग का पेट भर सकेगे. इस बीच मे डायरी मे रखे ढेरो पेपर पंखे की हवा से उड गये और दोस्त उन्हे इकट्ठा करने लगे, जब हम सहायता कराने लगे तो हमने पाया की पेपर के बीच से एक सूखे गुलाब के फ़ूल की पत्तिया गिरी . मामला संगीन समझ हमने सूघने की कोशिश की तो हम समझ गये कि खुश्बू से लबरेज ये डाक्टर साहब के प्रेम पत्र ही है. अब हम शिव भाई की तरह ज्यादा लालची आदमी तो है नही , सो बस एक पत्र कब्जे मे किया , डायरी का ख्याल दिलो दिमाग से निकाला.
वापस आने के बाद हमने बहुत कोशिश की कि उन पत्रो को पढ कर आप सबको भी लाभान्वित कराये .पर ऐसा हो ना सका. हमे ये तो यकीन था कि ये भाषा आंग्ल ही है, लेकिन कुछ समझ मे आये तो डिक्शनरी मे उसका हिंदी अर्थ देखकर समझे की क्या लिखा है. एक मेडिकल डिक्शनरी भी खरीद डाली, कि शायद इसमे कुछ शब्द मिल जाये लेकिन सब बेकार, इतनी मेहनत के बाद हमे भी लगने लगा कि बापू सही कहते थे.इतनी मेहनत जब पढने की उम्र थी तब करते जो जरूर िसमे लिखा कुछ समझ पाते.
आज हमने डाक्टर साहब का पत्र आखिरी बार पढने की कोशिश की , परंतु समझ ने ना आने सोचा कि किसी मेडिकल वाले से पढवाते है , आखिर वो ही हमारी नजर मे एक है जो डाक्टरो का लिखा देखकर दवाईया दे देते है.अत: हम पत्र को लेकर मेडिकल स्टोर पर भी गये ताकी पता चल सके उन्होने आखिर क्या लिखा है और आप सब को भी बता सके. लेकिन अफ़सोस कि मेडिकल स्टोर वाले सज्जन ने पहले तो ढेरो दवाये निकालनी शुरू करदी , और अंत ने चार छै जगह निशान लगाकर बोले कि भाई साहब ये दवाये मेरे पास नही है जिस डाकसाब को दिखाया है उनके पास के मेडिकल स्टोर पर मिल जायेगी.
हमने दूसरा रास्ता सोचा कि अपने डाक्साब को ही दिखा कर पता लगाये कि इसमे लिखा क्या है.
हमारे डाकसाब ने बडी गहरी नजर से पत्र देखा और साईड मे रख दिया .अरोरा साहब थोडा ये दो मरीज देख लू फ़िर आपसे बात करता हू.
उन्होने दो मरीज देखे परचा हाथ मे थमाया. फ़िर बडे गंभीर होकर मेरी और मुखातिब हुये. जी कौन बीमार है ? किसे दिखाया था ? कुछ दवाईया तो समझ मे आ रही है, लेकिन बिमारी कुछ अजीब सी लग रही है. आप अगर हो सके और उचित समझो तो मरीज को एक बार मुझे दिखा दो .वैसे मेरी राय यही है कि जहा आपने दिखाया था या तो वही पडोस से दवाये मंगवा लीजीये. या आप अगर उचित समझे तो डा. साब से बात करा दीजीये .मै फ़िर तो जो दवाये यहा नही मिल पा रही है मंगवा दूंगा या फ़िर उनकी जगह जो चल सकती है बदल दूंगा. लेकिन पहले ये तो समझ आये कि इत्ता बिमार कौन है ?
वैसे जिन्हे आपने दिखाया था ,दवाई आपको उन्ही के यहा से लेनी चाहिये थी. ये डाकसाब पुराने स्टाईल के है , कुछ लोग पहले दवाईयो के बजाय साल्ट के नाम लिख दिया करते थे, और उनका कंपाऊंडर साल्ट को पढ कर पुडिया बना देता था. लेकिन अब तो ऐसे लोग बहुत मुशकिल से मिलते है आप कहा पहुच गये ?
अब हमारी हिम्मत जवाब दे चुकी है . एक बार दिल मे आया कि मेरठ फ़ोन कर डाक्टर साहब से ही माफ़ी के साथ पत्र का हिंदी रुपांतरण करवाने की कोशिश की जाये पर डर इस बात का भी लगा कि डाक्साब अपने कंपाऊंडर से कुछ दवाईया ना दिलवादे .
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