एक डाक्टर का प्रेम पत्र.

 

पिछले हफ़्ते मेरठ जाना हुआ . वहा कुछ लोगो से भी मिले. जिनमे हमारे ब्लोगर्स दोस्त भी शामिल थे.वही हमे न्योता मिला एक डाक्टर दोस्त का. कहा हो भाइ इतने दिनो से कहा हो बिना मिले मत जाना. पहुचे जी मिलने ,लपक के मिले दोस्त , अच्छी आवभगत की. इस बीच दोस्त अपनी एक मोटी सी बडी पुरानी डायरी खोल कर हमे कुछ बताने लगे . सच मे दिल भर आया कि अगर ये डायरी हाथ लग जाये तो कितने दिनो तक हम अपने ब्लोग का पेट भर सकेगे. इस बीच मे डायरी मे रखे ढेरो पेपर पंखे की हवा से उड गये और दोस्त उन्हे इकट्ठा करने लगे, जब हम सहायता कराने लगे तो हमने पाया की पेपर के बीच से एक सूखे गुलाब के फ़ूल की पत्तिया गिरी . मामला संगीन समझ हमने सूघने की कोशिश की तो हम समझ गये कि खुश्बू से लबरेज ये डाक्टर साहब के प्रेम पत्र ही है. अब हम शिव भाई की तरह ज्यादा लालची आदमी तो है नही , सो बस एक पत्र कब्जे मे किया , डायरी का ख्याल दिलो दिमाग से निकाला.

वापस आने के बाद हमने बहुत कोशिश की कि उन पत्रो को पढ कर आप सबको भी लाभान्वित कराये .पर ऐसा हो ना सका. हमे ये तो यकीन था कि ये भाषा आंग्ल ही है, लेकिन कुछ समझ मे आये तो डिक्शनरी मे उसका हिंदी अर्थ देखकर समझे की क्या लिखा है. एक मेडिकल डिक्शनरी भी खरीद डाली, कि शायद इसमे कुछ शब्द मिल जाये लेकिन सब बेकार, इतनी मेहनत के बाद हमे भी लगने लगा कि बापू सही कहते थे.इतनी मेहनत जब पढने की उम्र थी तब करते जो जरूर िसमे लिखा कुछ समझ पाते.

आज हमने डाक्टर साहब का पत्र आखिरी बार पढने की कोशिश की , परंतु समझ ने ना आने सोचा कि किसी मेडिकल वाले से पढवाते है , आखिर वो ही हमारी नजर मे एक है जो डाक्टरो का लिखा देखकर दवाईया दे देते है.अत: हम पत्र को लेकर मेडिकल स्टोर पर भी गये ताकी पता चल सके उन्होने आखिर क्या लिखा है और आप सब को भी बता सके. लेकिन  अफ़सोस कि मेडिकल स्टोर वाले सज्जन ने पहले तो ढेरो दवाये निकालनी शुरू करदी , और अंत ने चार छै जगह निशान लगाकर बोले कि भाई साहब ये दवाये मेरे पास नही है जिस डाकसाब को दिखाया है उनके पास के मेडिकल स्टोर पर मिल जायेगी.

हमने दूसरा रास्ता सोचा कि अपने डाक्साब को ही दिखा कर पता लगाये कि इसमे लिखा क्या है.

हमारे डाकसाब ने बडी गहरी नजर से पत्र देखा और साईड मे रख दिया .अरोरा साहब थोडा ये दो मरीज देख लू फ़िर आपसे बात करता हू.

उन्होने दो मरीज देखे परचा हाथ मे थमाया. फ़िर बडे गंभीर होकर मेरी और मुखातिब हुये. जी कौन बीमार है ? किसे दिखाया था ? कुछ दवाईया तो समझ मे आ रही है, लेकिन बिमारी कुछ अजीब सी लग रही है. आप अगर हो सके और उचित समझो तो मरीज को एक बार मुझे दिखा दो .वैसे मेरी राय यही है कि जहा आपने दिखाया था या तो वही पडोस से दवाये मंगवा लीजीये. या आप अगर उचित समझे तो डा. साब से बात करा दीजीये .मै फ़िर तो जो दवाये यहा नही मिल पा रही है मंगवा दूंगा या फ़िर उनकी जगह जो चल सकती है बदल दूंगा. लेकिन पहले ये तो समझ आये कि इत्ता बिमार कौन है ?

वैसे जिन्हे आपने दिखाया था ,दवाई आपको उन्ही के यहा से लेनी चाहिये थी. ये डाकसाब पुराने स्टाईल के है , कुछ लोग पहले दवाईयो के बजाय साल्ट के नाम लिख दिया करते थे, और उनका कंपाऊंडर साल्ट को पढ कर पुडिया बना देता था. लेकिन अब तो ऐसे लोग बहुत मुशकिल से मिलते है आप कहा पहुच गये ?

अब हमारी हिम्मत जवाब दे चुकी है . एक बार दिल मे आया कि मेरठ फ़ोन कर डाक्टर साहब से ही माफ़ी के साथ पत्र का हिंदी रुपांतरण करवाने की कोशिश की जाये पर डर इस बात का भी लगा कि डाक्साब अपने कंपाऊंडर से कुछ दवाईया ना दिलवादे .

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पंगाकास्ट

वईव्र karat

 

कल जो कुछ हुआ जैसा भी हुआ, कोई खास मामला नही था. ये तो सामान्य सी बात थी . बस जरा मीडिया के द्वारा बाहर ज्यादा आ गई थी. वैसे जो नही आई वो ज्यादा विस्फ़ोटक हो सकती थी . लेकिन मामला पट गया. वाम मोर्चा को छोडकर मुलायम के अमर कंधे पर सरकार की डोली चली गई. अब करात ने जो कहा वो सुनिये.

 

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पंगाकास्ट ( सांसदो के लिये खास)

महगाई वाकई मे बढ गई है . सांसदो के भाव देखिये ,उनका सेंसेक्स रिकार्ड तोड रहा है. आज पहली बार मुझे देश गीता के वचनो पर चलता हुआ दिखाइ दे रहा है,

जो करना है अभी कर, कल क्या कहा था, कल क्या कहेगा इस विचार मे मत पड. फ़ल के हिसाब से कर्म करता रह.  चिंता मत कर , कोई वचन ,कोई धारणा, कोई विचार हमेशा के लिये नही होता. ये सब क्षण भंगुर होता है, हमेशा नये विचारो के लिये मन मस्तिष्क को खोले रखॊ,

जो आज मिल सकता है कल का क्या पता मिले न मिले .

संसद के सदस्यो को भावभीनी श्रद्धांजली के साथ उनका पसंद दीदा गीत सुनवा रहा हू. महमूद जी की आत्मा कॊ भगवान शान्ती दे ,उन्होने शायद इन्ही लोगो के लिये ये गीत गाया होगा.

"ना बीबी ना बच्चा ना देश बडा ना मईया , दा होल थिंग इस तैट के भईया सबसे बडा रुपईया"

 

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ये मै हू,जी हा मै ही हू (पंगाकास्ट)

ज्ञान दादा,सुरेश जी निलिमा जी , कुश जी ,संजय जी, नीरज जी समीर भाई , मैथिली जी, अविनाश जी लावण्या जी,सिद्धार्थ जी , अजीत जी ,अनूप जी ,मिश्रा जी , अफ़लातून जी का आदेश सर आंखो पर . आप सभी लोगो ने मेरी होसला अफ़जाई की तो अब झेलिये भी .:) अब मै यहा कम से कम अपनी पसंद के गाने आपको जरूर सुनवाया करूंगा . तो लीजीये मेरे दिल के करीब जो गाने है ये उनमे से एक है .नीरज जी के शब्दो को स्वर दिया है मुकेश जी ने . शंकर जयकिशन ने संगीत को एक उदास धुन से शुरुआत कर खोखली ह्सी के साथ जिस तरह उंचाईयो पर पहुचाया है वो वाकई एक संगीत के पल पल मन पर होते परिवर्तन को देखने के लिये दर्शनीय बन गया है .

 

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मै इधर जाऊ या उधर जाऊ

वैसे मै भी उस असीम शक्ती के होने मे विश्वास रखने वाला खुदा से डरने वाला उसके हर निवास मंदिर मस्जिद गुरुद्वारो पर मत्था झुकाने वाला बंदा हू. पर कभी कभी मन मे एक सवाल खडा होता है कौन हू मै ? हिंदू मुस्लिम इसाई ? क्या हू मै ? मेरा मन मुझे किस धर्म मे रखता है . किस धर्म की नाव मे बैठ कर मै इस जीवन की नैया को खे रहा हू. उस और मै फ़िर यही सोचने पर मजबूर हो जाता हू कही मै आस्तिक का ढोंग करने वाला नास्तिक बंदा तो नही . लेकिन मै किसी ढकोसले मे यकीन नही रखता, ना ही किसी खुशवंत सिंह की तरह अपने को नास्तिक कहकर उस धर्म के चिंन्हो को जिंदगी भर ढोने के लिये मजबूर हू. ना ही मुझे किसी धार्मिक स्थल मे जाकर उस जगह के पाखंडो को महिमा मंडित करने का शौक है. लेकिन किसी भी धार्मिक स्थल पर पहुचने के बाद उस ईश्वर के सम्मान मे सर झुकाना , या यू कहे कि उस तरह से इश्वर के मानने वालो के सम्मान मे सर झुकाना अगर आस्तिकता है तो मै आस्तिक हू.वरना मुझे ईश्वर की जहा याद आ जाये मै वही शीश नवा लेता हू. वो जगह चाहे जो भी हो जहा भी हो. अगर उस शक्ती को मानना “जो इस निजाम को चलाती है, एक स्वचालित तरीके से “मानना , मान देना आस्तिकता है तो मै भी आस्तिक हू.

जब हम ये मानते है को वो इश्वर सर्वव्यापी है तो फ़िर हमे मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे मे जाकर उसको अपने दुखो कि याद दिलाने की क्या जरूरत है . क्या वो हमे हर वक्त नही देखता, गर देखता है तो फ़िर उसे हमारी सहायता के लिये हमारे मंदिर मस्जिद आने का इंतजार क्यो ?

यिशू मेरी सहायता तभी करेगा जब मै उसे मानूंगा, जब मै चर्च जाऊंगा जब मै उसे परम पिता मानूंगा तो वो कैसा भगवान काहे का दयालू. फ़िर उसमे और बुश मे या लादेन मे क्या फ़र्क .वहा भी यही है ना कि हम उन्हे मान दे उनके बताये रास्ते पर चले तो वो हमारी सहायता के लिये हाजिर होंगे .वो मुझे तभी चंगा करेगा ? तभी मेरी समस्याओ का निराकरण करेगा ? क्या जब मै उसके सामने घूटने टेक कर  प्रार्थना करू ? उसके किसी पादरी के आगे अपने पापो के लिये माफ़ी मांगू ? अगर मै धर्म से हिंदू हू और बपतिस्मा की रस्म अदायगी कर इसाई नही बनता तो वो आसमानी खुदा मेरे उपर अपनी दया का हाथ नही रखेगा ? मुझे चंगाई नही देगा ? तो फ़िर वो कैसा खुदा जो सिर्फ़ अपने मानने वालो के उपर हाथ रखता है ? क्या फ़रक पडता है उस भगवान को गाड को खुदा को मेरे जनेऊ से, मेरे बपतिस्मा से , मेरे खतने से ?

मै ह्फ़्ते भर से देख रहा हू कि शिरडी के साई बाबा ने दर्शन कर लौटते अपने भक्तो को बचाया. अगर शिरडी के साई बाबा सिर्फ़ अपने भक्तो के लिये ही सहायक है. अगर वो सिर्फ़ अपने भक्तो और वो भी जो उनके दर्शन कर लौट रहे है को बचाने के लिये हाजिर है .यानी जो  लोग जो एक्सीडेंट मे मर जाते है या घायल हो जाते है, तो क्या उनकी इस गलती के कारण साईबाबा उन्हे नही बचाने नही आते कि वे उनके दर्शन करने नही आये थे. तो साईबाबा और किसी पार्टी के नेता या सरकारी अधिकारी मे क्या अंतर रहा . वहा भी चढावा नही चढायेगे तो काम नही होगा और यहा भी ?

अगर भगवान ही अपने बंदो से मिलने मे पैसे की शक्ती से मिलता है दर्शन देता है.तो क्यो मानू मै उसे भगवान, और वो दलितो ( वैसे दुनिया मे मेरे हिसाब से दलित वही है जिसके पल्ले पैसा ना हो )से मिलने मे अशुद्ध हो जाता है तो किसी को क्या शुद्ध करेगा ? कैसा और काहे का भगवान जो मनुष्य मात्र मे छुआ छूत को प्रदिपादित करता है.

कैसा है वो भगवान जो सिर्फ़ एक विशेष पूजा और विशेष नक्षत्र मे विशेष सामग्री के साथ कराने पर ही प्रसन्न होता है ?. अगर वो सर्वशक्तिमान है तो उसे मेरे से ये पूजा कराने की ललक क्य़ू ? वो मुझे जो देना चाहता है वैसे ही क्यो नही देता ? क्यो उसने मुझे परेशानियो मे घेरा हुआ है ? क्या सिर्फ़ इसलिये कि मै उसके मंदिर मस्जिद चर्च मे आऊ ? उसके सामने घुटनो पर बैठ कर गिडगिडाऊ ?

फ़िर क्या अंतर है एक मनुष्य मे और उसमे ? दोनो मे एक जैसी दानवीर बनने और कहलाने की ललक मे कहा अंतर है ?  मै दूसरो का हक मारकर अगर उसके सामने चढावा चढाता हू तो वो खुश होगा ? उसे क्या जरूरत है जगह जगह अपने घर बना कर बैठने की ? उसके लिये मेरा घर , तेरा घर क्यो ? उसे यिशू रूप मे है तो राम के घर आने मे, बालाजी रूप मे है तो चार्ली के घर जाने मे क्या विरोध ?   

शायद मै कबीर पंथी हू .

पाथर पूजे हरि मिले , तो मै पूजू पहार

ताते ये चाकी भली जाकौ पीसा खाय संसार

काकर पाथर जोडके मस्जिद लई बनाय

ता चढ मुल्ला बाग दे क्या बहरा हुआ खुदाय

लेकिन नही मै वो भी नही हू, मै कबीर के भजन नही गाता, मै कबीर पंथियो के साथ कबीर के मंदिर नही जाता, मै कबीर के दोहे लेकर किसी के उपर आक्रमण नही करता. मै किसी को उसका नाम ले नही गरियाता , तो मै कबीर पंथी नही हू

शायद मै रैदास के पंथ का हू?

नही मै केवल रैदासका एक वाक्य ही जानता हू “मन चंगा तो कठौती मे गंगा” लेकिन ना मै रैदासके मंदिर मे आजतक गया. नाही उनके पंथ के किसी गुरू को गुरू बनाया ?

ढेरो उठते सवाल और जवाब अनुत्तरित है . आखिर कौन हू मै किस धर्म का पालन कर रहा हू मै ? क्यो किसी धर्म मे जीने की कोशिश कर रहा हू मै ? क्या मै बिना किसी धर्म के इस जीवन को नही जी सकता ? क्या है मुक्ती ? क्यो चाहता हू मै मुक्ती इस जीवन से ? क्यो भागना चाहता हू मै कर्म करने से ? अगर ये आना जाना यू ही लगा रहे तो परेशानी क्या है ? क्या आपके पास है मेरे सवालो का जवाब ?

(अगले अंक मे भी जारी)

छोड दे मंदिर मस्जिद सारे, छोड दे जाना गुरुद्वारा

कभी किसी से दगा ना करना, बस इतना गुन ले यारा”

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लीजीये सुनिये हमारा पहला पंगाकास्ट

हमारी पिछली पोस्ट पर कुछ ज्यादा ही हंगामा हो गया. दो दो लोग बिना बात के सफ़ाई देने मे पिल पडे . जबकी सही बात यही थी कि हमारे पडोसी अध्यापक की चिट्ठी थी ये . लेकिन साहब “चोर की दाढी मे तिनका ” को सत्य साबित करने के लिये दो दो साहब सफ़ाई देने आ गये .वैसे हमे यही महसूस हुआ कि वो हमे सफ़ाई देने के बजाय ये वाला गाना गा रहे थे . कौन सा ये वाला साहब जरा क्लिकियाईये और खुद ही सुन लीजीये जी. 

कैसा लगा बताईयेगा जरूर
 यूनूस जी गुरूदेव चेला कितने नंबरो से पास हुआ बताना मत भूलना

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एक प्रेम पत्र फ़्रिज पर चिपका हुआ

पिछले दिनो मुझे अपने एक मित्र के घर जाना पडा . दोनो मिया बीबी अध्यापक है बारी बारी से सुबह और श्याम की शिफ़्ट मे सरकारी कालेज मे बालको को पढाने का कार्य करते है . जब मै उनके घर पर चाय का रस्वादन कर रहा था . अचानक एक कागज का टुकडा फ़्रिज से उडता हुआ आकर मेरे पैर के पास फ़डफ़डाने लगा. मैने उसे उठाकर टेबल पर रखदिया. मित्र नहाने मे लगे थे और हमारा ध्यान उस कागज पर लिखे मजनून पर चला गया. अरे ये क्या ये तो आजकल ना दिखने वाला कागज था . इस पर तो एक सुबह की शिफ़्ट मे काम करने वाली अध्यापिका ने दोपहर की शिफ़्त मे काम करने वाले अध्यापक को दिशा निर्देश दे रखे थे . कुल मिला कर हमने बेईमानी करने की ठान ली . पत्र वहा से गायब हुआ और अब आपके सामने है . केवल नाम की जगह संबोधन से काम चला दिया गया है.  इसी से हमे पता चला कि दिखने मे  निहायत शरीफ़ और सीधे लगने वाले मास्साब हमे भी दिन मे ही वो भी सुबह सुबह क्यो बुलाते थे.

मै कालेज जा रही हू . तुम्हारा लंच और ब्रेकफ़ास्ट टेबल पर हाट केस मे पडा है गरम कर खा लेना . .कल की तरह दोस्तो के साथ बाजार मे मुंह मारने मत चले जाना .और तुम्हारे ये घटिया दोस्त मेरे जाते ही भुक्खडो की तरह घर मे घुसा लेते हो ना जाने कब सुघरोगे ? फ़िर सारी रात एसीडिटी के कारण शोर मचाते रहते हो .चाय बनाते समय चीनी के डब्बे मे गीली चम्मच मत डाल देना. दोस्तो को चाय क्लास मे ही देना , खबरदार जो क्राकरी को हाथ लगाया , तुम इन दोस्तो के चक्कर मे दो सेट पहले ही खराब कर चुके हो. प्रेस वाले भईया को सोफ़े पर पडे कपडे प्रेस के लिये और १५ रुपये २० पैसे भी दे देना. उसे बोलना अगली बार कोई कपडा जला तो पैसे काट लूंगी. सरला को कहना कि सफ़ाई ढंग से करे और अपनी बहू को काम के लिये हमारे यहा मत भेजे. तुम कल भी उससे यह कहना भूल गये थे . दुबारा मुझे अगर पडोसियो से पता चला कि तुमने उसकी बहू को फ़िर घर के अंदर घुसने दिया तो तुम्हारी खैर नही.उससे फ़र्श की सफ़ाई ठीक ढंग से करा लेना . कल शाम जो तुमने तेल बिखेरा था वो मुझे आज दिखना नही चाहिये.

दूध गरम कर टेबल पर रखा है उठते ही ध्यान से फ़्रिज मे रख देना. परसो भी तुमने बच्चो को दूध देकर भगौना टेबल पर ही छोड दिया था. तुम्हारी लापरवाही से सारा दूध फ़ट गया था. बर्तन ढंग से साफ़ कर लेना . कल भी रात की सब्जी चिपकी दिखाई दे रही थी.क्राकरी मैने धोकर रखदी है.

सब्जी वाले भईया से कटहल और भिंडी पाव पाव ले लेना . ध्यान रहे अगर आज भी आधाकिलो ली तो पूरे हफ़्ते तुम्ही खाओगे. कटहल को काट कर फ़्रिज मे रख देना ,पिछले हफ़्ते तुमने टेबल पर छॊड दी थी काली पड गई थी.

नहाकर अपने निक्कर बनियान तोलिया बाहर टेरेस पर डालना बेड पर बदबू मत फ़ैलाना. कंप्यूटर टेबल पर बैठकर नाश्ता मत करना. सारा गंदा कर देते हो.

आजकल देख रहीं हूं की तुम घर के काम से बहुत जी चुराते हो, अभी परसों जब तुम्हारे बर्तन साफ करने के वक्त सड़क पार वाले शर्माजी आये तो तुम फौरन बरतन छोड़ कर बाहर आ गये. लगता है तुम्हारे भीतर का (मै मर्द हू) अभी भी जिंदा है जिसे दूसरों के सामने घर का काम करने में शर्म आती है वरना शर्माजी को किचन में ही क्यों न बुला लिया?

याद रखो में दो सदी पहले की नहीं. आज की सच्ची नारी मुक्ती में विश्वास करने वाली नारी हूं. अगर मैं अपनी सहेली के सामने स्कूल की कापियां चैक कर सकती हूं, तो तुम्हें भी अपने दोस्त के सामने बर्तन मांजने में शर्म नहीं होनी चाहिये. आज जब मै नौकरी के साथ घर का काम करने मे कोई शरम नही करती तो तुम क्यो कतराते हो ?

वैसे तो तुम्हें बदलने की मेरी हर कोशिश बेकार रही है, क्योंकि खुद को श्रेष्ठ समझने की फितरत तुम सारी मर्द जाती में ही अंदर तक भरी है. वो तो मेरा असर है जो तुम अब अपनी गलतियां समझने लगे हो, वरना तुम भी बाकी पुरुषों की तरह बाहर से बराबरी का नाटक करो, और अंदर से स्त्री को हीन समझो.

मुझे पता है तुम्हें ग्लानी हो रही होगी, और आज शाम तुम जरूर फिर से माफी मांगोगे. लेकिन कोई फायदा नहीं, करना तो तुम्हें फिर से वही है. आखिर कुछ भी कर लो, अपने भीतर के पुरुष को नहीं मिटा सकते न.

वैसे तो तुम जैसे भी हो, बाकी पुरुषों से श्रेष्ठ हो, कम से कम पितृ-सत्ता की भावना तुममें उतनी नहीं जितनी औरों में है. काश तुम इससे पूरी तरह मुक्त हो पाते. लेकिन सदियों से पल रही कुंठायें एक दिन खत्म नहीं हो जाती. हां, अगर मेरी तरह सारी नारियां ये संकल्प कर लें कि खुद को पुरुष के अनाचार से मुक्त करना है, तो नारी-मुक्ती की क्रांति बहुत जल्द सफल होगी.

अलार्म घडी मे १.३० का अलार्म लगा दिया है  मुन्ना और चुन्नी को लेने स्टाप पर समय पहुच जाना. कल मुझे मिसेज गोयल से तीसरी बार तुम्हारे कारण सुनना पडा है कि तुम या तो बाद मे पहुचते हो या फ़िर पहले पहुच कर उस मिसेज राजपाल की उस एगंलो इंडियन मेड से चिपके रहते हो. थोडॊ शरम करो और सुधर जाओ.घर मे मेरे पीछे ये अपने फ़ालतू दोस्तो को बुलाना बंद करो.

कल मैट्रो स्टेशन पर मिस लिजा से बहुत चिपक रहे थे . मेरे साथ भी बहुत सारे अध्यापक आते जाते है ये ध्यान रखना . शाम को समय से घर आकर खाना बनाना . अगर आज भी बाजार से पैक करा कर लाये तो मै भी नाश्ता और लंच बनाना बंद कर दूंगी . और एक बात ध्यान से सुन लो कि  मै इस बार तुमसे बोलने वाली नही हू और ये तुमहारी रात वाली लल्लो चप्पो मुझे और गुस्सा दिला रही है . अगर तुम ये सब करने के बजाय अपने आपको सुधारो तो ज्यादा अच्छा होगा.

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कौन कहता है कि भारत खड्डे मे जा रहा है ?

कल एक दोस्त मिले बडे व्यथित थे. देश की हालत बुरी है, इन राजनीतिक पार्टियो की अवसरवादिता देखो ? तुम्हे नही लगता ये देश को खड्डे मे लेजा रहे है . ले क्या जा रहे है ले जाकर ही मानेगे. हमे भी डर लगने लगा . लगा की अगर लोग कह रहे है तो देश अवश्य खड्डे मे जा रहा होगा . लेकिन तभी हमे एक बात सूझी अगर देश खड्डे मे जा रहा है तो यकीनन कही ना कही इतना बडा खड्डा अवश्य होगा . जिसको देश से भरने के लिये इन कमबख्तो ने पैसा खालिया होगा. वरना ये लोग अब तक देश को खड्डे मे जाने से बचाने के लिये ढेरो स्कीमे ले आते टेंडर दिये जाते और अरबो का घपला कर डालते . अब हम ठहरे व्यापारी.हमने भी सोचा देश खड्डे मे जा रहा है. कही  हमे ये पता लग जाये कि किस खड्डे मे जाने वाला है. तो पहले से ही वहा अपना खोमचा जमा ले . आपको ये तो पता ही है कि हम बडे भारी मेहनती किसम के आदमी है ,लिहाजा हमने पूरी दुनिया मे इतने बडे खड्डे ढूंढ डाले. लीजीये आप भी देख डालिये

१.

१

ये है दुनिया का सबसे बडा आजतक का मानव खोदित खडडा . १९१४ मे इसे और खोदना बंद कर दिया गया था. तब से अब तक ये सिर्फ़ १०९७ मीटर गहरा ही है .इसमे से २२.५ लाख मिलियन टन मिट्टी निकाली गै थी और लगभग तीन ट्न हीरे. इसका नाम है ” किम्बर्ले खड्डा”

२.ग्लोरी खड्डा

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ये मोंटीसेलो नाम के बांध  मे बनाया गया  है.इसका प्रयोग बांध से उसकी क्षमता से ज्यादा पानी आने पर , पानी को निकालने के लिये किया जाता है.

३.

५

ये खड्डा है केवल ७५० मीटर गहरा और २५०० मीटर चौडा . लेकिन ये अभी भी बडा हो रहा है.

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६ 

ये खडडा १४५ मीटर गहरा और लगभग २५० मीटर चौडा है.

बस जी यही खड्डे है दुनिया मे और मुझे नही लगता कि किसी भी एंगल से ये इतने बडे है कि भारत जैसा देश इनमे समा सकता है तो अब आप भी खुश हो जाईये कि जो लोग देश को रसातल या खड्डे मे जाता देख रहे है उन्हे आखो को टेस्ट कराने की जरूरत है. हमरे ये नेतागण कितनी भी मेहनत करले देश खड्डे मे तब तक नही जा सकता जब तक की कोई विशेष खड्डा ना खुदवाया जाये. और जब ऐसा होगा तो हमे उम्मीद ही नही विश्वास है कि हम भी जरूर कोई ना कोई छोटा मोटा ही सही टंडर हथिया ही लेंगे.

चलते चलते हम आपको एक गुजरे कल की बडी क्रिकेट हस्ती से मिलवाते है. जो हमे कल बाबा फ़रीदी की मजार के बाहर बैठे दिख गये थे पता नही यो ये द्रविड जैसे दिख रहे है :)

रव्रव्र

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एक राजनीतिक चिट्ठी

ये चिट्ठी लिखी थी सोनिया जी ने मुलायम जी को , हरकारे थे दोस्तो के दोस्त महादोस्त अमरसिंह जी , वो तो सोनिया जी के बुलावा पाते ही सारे दुखडे , अपनी प्लेट मे रखे टुकडे  देखते ही भूल गये. जिस दरवाजे पर वो बिना बुलाये कुकुर की तरह अक्सर दुम हिलाते फ़िरते थे , उस घर के अंदर बुलाये जाने से ही इतने प्रफ़ुल्लित हो उठे. कि सोनिया जी की चिट्ठी उन्होने घर से बाहर निकलते ही खुशी मे नाच नाच कर उडा दी , वहा से ये लग गई हमारे हाथ , और अब पहली बार आपके सामने पेश है

 सोनिया की चिट्ठी मुलायम के नाम

पीर मेरी प्यार बन जा
भग गये मेरे गधे कुछ
देदे तू अपने गधे कुछ
आजा मिलकर कर ले बात

तू माया से सवा सेर बनजा, पीर मेरी प्यार बनजा


मै हाथ रख दूंगी साईकल पर,

तू  भी सदन मे हाथ उठा दे

रोज रोज वो अकड रहे थे

बात बात पर बिगड रहे थे

मैने दिया झटका उनको

तू भी उनको दूर भगा दे

लेफ़्ट से तुझको क्या मिलेगा
केस हटा दूंगी मै सारे,

तू मेरा तरणहार बनजा ,पीर मेरी प्यार बन जा

अमर ने भी माफ़ किया जब
मै भी हूँ इतनी बुरी कब
अमर सिंह से बात कर ली
शर्ते सारी साफ़ कर ली

लेफ़्ट ने किया बहुत मट्क्का

लेफ़्ट को इक  देकर  धक्का
तू मेरी दीवार बन जा, पीर मेरी प्यार बन जा
देश की चिन्ता तुझे कब
देश की चिन्ता मुझे कब

छोड अब उत्तर प्रदेश को
लूटन में सारे देश को,

तू मेरा मददगार बन जा ,पीर मेरी प्यार बन जा


मेरा चेला है मनमोहन
तू भी है अमर का भाया
दे देगे तुझको भी थोडा

महंगाई बढाकर जो कमाया
मिल बाट कर खालेंगे अब,

तू मेरा हमराह बन जा ,पीर मेरी प्यार बनजा

मुकेश के हम गले लगेगे

अमित को ना झेल सकेगे
कुछ सांसद तेरे साथ भी हैं
कुछ निर्दलीय मेरे पास भी हैं
सवा सत्यानाश करने मे देश का,

तू भी जुम्मेदार बन जा, पीर मेरी प्यार बन जा

वोट का तू गणित लगाले

नोट का भी हिसाब सजाले

सोचना है तुझको प्यारे

केस है तुझ पर ढेर सारे

नोट से मालामाल होगा

या अमर कंगाल होगा

अमेरिका की इस डील मे

तू भी हिस्सेदार बनजा, पीर मेरी प्यार बनजा

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हम भी व्यस्त है जी, सच्ची मे

हम व्यस्त है सच्ची मे जी भगवान की कसम उठवा लो. ये बात हम हाथ मे आग पानी , अगडम जी के लिये आलू से लेकर टमाटर तक उठाकर कह सकते है.ये हिंदी ब्लोगिंग की खासियत है . कि ब्लोगर को बार बार दूसरो को ये बताना ही पडता है कि हम बिजी है व्यस्त है हमारे पास भी काम है हम खाली आदमी नही है देश की सरकार की हमारे उपर बहुत जिम्मेदारिया है , ये तो हम अपने व्यस्त समय से समय चुराकर आप सब पर एहसान की टोकरॊ लादते रहने के चक्कर मे ब्लोगिंग करते रहते है और आप है कि मानते ही नही.

आप क्या मजाक समझते है ? जब हम किसी आफ़िस मे काम करने के बजाय धीरे से फ़ुरसत निकाल कर आपकी पोस्ट पर टिपिया रहे होते है, तो देश का कितना नुकसान होता है फ़िर भी हम आपके प्यार के लिये टिपियाते है, पोस्टियाते है. (  अब ये अलग बात है कि पहले हम उस समय का प्रयोग अपने सहकर्मियो से चुहुल करने उनके साथ पान की दुकान पर पान खाने जाने मे, रिश्तेदारो को फ़ोन करने मे बिताते थे. तभी तो हमे कोई माई का लाल दो चार घंटे लगाये बिना ढूंढ नही सकता था)

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वैसे आपसे क्या छुपाये इस ब्लोगिंग मे आने का एक लाभ तो हमे भी हुआ है, बास भी ये देख कर खुश रहता है कि अब हम कम से कम आधे दिन अपनी सीट पर ही चिपके रहते है. भले ही वो ये जरूर कहता रहे तुम दो शीट निकालने मे पूरा दिन लगे रहते हो कोई कोर्स क्यो नही कर लेते.लेकिन हमारी लगातार दिखती मेहनत से वोह वाकई खुश है और शायद हमारी पदोन्नति के बारे मे भी जल्द कोई खबर आ जाये.

देखिये दिन भर कितनी व्यस्तता रहती है.दिन ने कई बार चाय भी पीनी पडती है. इधर हमे जुकाम भी है गले मे खराश भी, दाये कान मे कभी कभी खुजली भी महसूस होती है.बाये पैर की कौने से तीसरे वाली उंगली का नाखून भी बडा हो गया है हम उसे कटवाने जाने तक का वक्त नही निकाल पा रहे है . मानीटर की स्क्रीन पर  को दाये से बाये देखने के लिये आंखॊ के लेंस से जुडी मासपेशियो के खिचाव का खतरा बना रहता है, लिखते समय टकंण यंत्र के उपर बने चिन्हो को लगातार बार बार दबाने के लिये उंगलियो और कोहनी की हड्डियो और मांस पेशियो का बिगडता तार तम्य बार बार हमे हमारे चिकित्सक के पास जाने के लिये निर्देशित करता है , लेकिन फ़िर भी हम इतनी सारी व्यस्तताओ और स्मस्याओ के बीच आपके लिये  टिपियाने का कष्ट कर ही लेते है. और आप है कि हमारे ब्लोग पर पधार कर धन्यवाद देने मे भी कजूसी दिखाजाते है.

       ऐसा हम नही कह रहे जी , हम ऐसा कह ही नही सकते , हम तो हमेशा शुक्र गुजार रहते है आपके कि आप पधारे और हमे राय देते रहते है .ऐसा लोग कहते है हम तो आपसे बस यही कह रहे है कि वाकई आजकल हम अपनी कार्यशाला मे बहुत व्यस्त है और आपसे माफ़ी चाहते है कि पिछले कुछ दिनो से ना तो कुछ पढ पा रहे है ना ही टिपिया पा रहे है. उम्मीद है आने वाले हफ़्ते के मध्यांत तक हम अपने सामान्य दिन चर्या पर लौट आयेगे . अगर आपके हमारे कहे पर भरोसा नही है तो आलोक जी (अगडम बगडम वाले) से पूछ ले . पिछले दिनो जब वो अपने आलू टमाटर , चावल और घी हमसे लेने आये थे ( बाबा फ़रीदी सम्मान समारोह मे  सम्मान मे प्राप्त सामग्री हमरे पास छोड कर आलोक जी जल्दी मे बस पकड कर निकल गये थे वाली)तब उन्होने भी देखा था.वैसे मै उम्मीद करता हू कि मेरा ये अपनी कार्यशाला मे लिया हुआ पंगा इस हफ़्ते मे निपट ही जायेगा तब मै पुन: आपसे पंगे लेने के लिये हाजिर हूंगा. आज हमे जरा फ़ुरसत मिली है तो हमने पोस्ट ठेल दी है . लीजीये लगे हाथो एक फ़ुरसतिया कविता भी झेल लीजीये

हम यहा व्यस्त है

उधर काग्रेस सपा

हनीमून मे मस्त है

वो दिन भुले है

धक्का दिलवाया था

खाने की प्लेट छीन कर

धक्का खिलवाया था

सोनिया की फ़िर से फ़ेकी

उसी प्लेट की झूठन चाट्कर

खुश हो रहे है सपाई

सैकुलर का टैग टांककर

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